कोशिश है मौन को समझने की..
बिना मतलब जीने की स्वार्थी नहीं होने की...
मुझे अनबन सी है..खुद से..खुदी से ..खुदाई से..
फिर डरता हू गलत सी लगती सच्चाई से..
अपनी ही अच्छाई से..
नहीं समझा मैं जिंदगी क्या है..दुखी हू खुश हूँ क्या हूँ..अगर हूँ तो कितना हूँ..
रोता हूँ हसता हूँ जीता हूँ तो समझो रोज मरता हूँ..
और फिर भी मरने से डरता हूँ..
लड़ता हूँ झगड़ता हूँ अपने लिए....
और अपना वजूद...
खोजता हूँ फिर मौन हो जाता हूँ
कोशिश करता हूँ खुद को समझने की
बिना मतलब जीने की और स्वार्थी नहीं होने की
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