Thursday, February 14, 2008
Friday, January 11, 2008
धन्यवाद
सभी को धन्यवाद..
शुभकामनाओं के लिए..
सोचे गए संभावनाओं के लिए..
शब्द कहाँ होते है सभी भावनाओं के लिए..
अक्सर रह जाता हूँ मैं निरुत्तर
ताकता रह जाता हूँ दीवारों को असमान को
शायद कुछ फूटे, शब्द बरसें
कर सकूं कुछ और समर्पण
आपकी आशाओं के लिए
पर एक ही शब्द है "धन्यवाद" आपकी शुभकामनाओं के लिए..
शुभकामनाओं के लिए..
सोचे गए संभावनाओं के लिए..
शब्द कहाँ होते है सभी भावनाओं के लिए..
अक्सर रह जाता हूँ मैं निरुत्तर
ताकता रह जाता हूँ दीवारों को असमान को
शायद कुछ फूटे, शब्द बरसें
कर सकूं कुछ और समर्पण
आपकी आशाओं के लिए
पर एक ही शब्द है "धन्यवाद" आपकी शुभकामनाओं के लिए..
प्यार में प्यार की जरुरत कितनी
निष्ठुर लगता हूँ मैं उनको
हूँ ही ऐसा क्या करूं
इतने से मेरा काम तो नहीं चलता
उनसे दूर तो हो भी नहीं सकता
हूँ ही ऐसा क्या करूं
इतने से मेरा काम तो नहीं चलता
उनसे दूर तो हो भी नहीं सकता
सहमत होना अच्छा है
सहमत होना अच्छा है पर मुश्किल है समझना स्वार्थ का पैमाना
प्यार होता है कैसे, कोई अपना सा लगता है कैसे और कोई पराया कैसे?
प्यार होता है कैसे, कोई अपना सा लगता है कैसे और कोई पराया कैसे?
कोशिश है मौन को समझने की..
बिना मतलब जीने की स्वार्थी नहीं होने की...
मुझे अनबन सी है..खुद से..खुदी से ..खुदाई से..
फिर डरता हू गलत सी लगती सच्चाई से..
अपनी ही अच्छाई से..
नहीं समझा मैं जिंदगी क्या है..दुखी हू खुश हूँ क्या हूँ..अगर हूँ तो कितना हूँ..
रोता हूँ हसता हूँ जीता हूँ तो समझो रोज मरता हूँ..
और फिर भी मरने से डरता हूँ..
लड़ता हूँ झगड़ता हूँ अपने लिए....
और अपना वजूद...
खोजता हूँ फिर मौन हो जाता हूँ
कोशिश करता हूँ खुद को समझने की
बिना मतलब जीने की और स्वार्थी नहीं होने की
बिना मतलब जीने की स्वार्थी नहीं होने की...
मुझे अनबन सी है..खुद से..खुदी से ..खुदाई से..
फिर डरता हू गलत सी लगती सच्चाई से..
अपनी ही अच्छाई से..
नहीं समझा मैं जिंदगी क्या है..दुखी हू खुश हूँ क्या हूँ..अगर हूँ तो कितना हूँ..
रोता हूँ हसता हूँ जीता हूँ तो समझो रोज मरता हूँ..
और फिर भी मरने से डरता हूँ..
लड़ता हूँ झगड़ता हूँ अपने लिए....
और अपना वजूद...
खोजता हूँ फिर मौन हो जाता हूँ
कोशिश करता हूँ खुद को समझने की
बिना मतलब जीने की और स्वार्थी नहीं होने की
एक दुःख से संबंधित
एक दुःख से संबंधित हूँ..जानना चाहता हूँ कितना करता है आदमी बिना मतलब की बात..मतलब कि वो बेमतलब है कितना..या फिर बिना मतलब आपके करीब है कितना..या .. स्वार्थ कम है कितना..सीधे ये कि आदमी के निःस्वार्थ होने का मतलब क्या है..?
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