Wednesday, December 12, 2007

झुका है सर बंदगी में..इंसान हूँ..
खुले हाथ आसमान हूँ...
उठे जब चेहरा आफताब हूँ..
मैं इंसान हूँ.
अभी तक चुप हूँ न समझो खो गया..
आँख बंद है, न समझो सो गया
बन रही योजना युग का पुनर्निर्माण हूँ
मैं एक इंसान हूँ.
उम्मीद हूँ तर्क हूँ सतर्क हूँ
आस्था और धर्म हूँ
अन्धकार मिटाने को जल रही मशाल हूँ ..मैं इंसान हूँ
आनलाइन है अब एक साथ
कईयों से प्यार की बात..
बड़ा दिलचस्प है इस सच्चे प्यार की बात.. ?

वो बनाते रहे हमें बेवकूफ
बहुत खुश थे..
हम उनकी इसी नादानी पर खुश थे..!!
मुझे भी पसंद न था..गिर गिर के उठना..
दरिया में पत्ता गिरा.. बहता चला गया..
खुदाई बड़ी चीज़ है..मेरी समझ में नहीं आती
खुद को कब से यही समझा रहा हूँ मैं

शौक अपना नहीं लिख्नने की बुरी आदत भी नहीं..
पहुच जाऊ आपतक किसी तरह...कोशिश है अपनी..