Thursday, February 14, 2008


आँखों की नमी को
देखता
है
हर कोई
क्या तुमने कभी
बंज़र जमीन की
सिसकियों को महसूस किया है ......प्रज्ञा



ऐसा नहीं कि मुझे महसूस नहीं होता
बस मेरे एहसास का सबूत नहीं होता..
बंजर जमीन को आसुओ से सींचा है..
नदियों को धमनियों से जोडा है
समंदर कितने सीने में दबाया है
तब जाके मौसम कुछ बदला है

Friday, January 11, 2008

धन्यवाद

सभी को धन्यवाद..
शुभकामनाओं के लिए..
सोचे गए संभावनाओं के लिए..
शब्द कहाँ होते है सभी भावनाओं के लिए..
अक्सर रह जाता हूँ मैं निरुत्तर
ताकता रह जाता हूँ दीवारों को असमान को
शायद कुछ फूटे, शब्द बरसें
कर सकूं कुछ और समर्पण
आपकी आशाओं के लिए
पर एक ही शब्द है "धन्यवाद" आपकी शुभकामनाओं के लिए..

प्यार में प्यार की जरुरत कितनी

निष्ठुर लगता हूँ मैं उनको
हूँ ही ऐसा क्या करूं
इतने से मेरा काम तो नहीं चलता
उनसे दूर तो हो भी नहीं सकता

सहमत होना अच्छा है

सहमत होना अच्छा है पर मुश्किल है समझना स्वार्थ का पैमाना
प्यार होता है कैसे, कोई अपना सा लगता है कैसे और कोई पराया कैसे?